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नवरात्रि पूजा 8 – 15 अप्रैल
नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरेभारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। पौष, चैत्र, आषाढ, अश्विन प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों - महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं। यह भारत के विभिन्न राज्यों में अलग – अलग प्रकार से मनाया जाता है।
नौ देवियाँ है :-
शैलपुत्री - इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है। पुराणों में यह कथा प्रसिद्ध है कि हिमालय के तप से प्रसन्न होकर आद्या शक्ति उनके यहां पुत्री के रूप में अवतरित हुई और इनके पूजन के साथ नवरात्र का शुभारंभ होता है.
ब्रह्मचारिणी - इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी।भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती की कठिन तपस्या से तीनों लोक उनके समक्ष नतमस्तक हो गए. देवी का यह रूप तपस्या के तेज से ज्योतिर्मय है.
चंद्रघंटा - इसका अर्थ- चाँद की तरह चमकने वाली। यह देवी का उग्र रूप है. इनके घंटे की ध्वनि सुनकर विनाशकारी शक्तियां तत्काल पलायन कर जाती हैं.
कूष्माण्डा - इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है।इनकी हंसी से ही ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ था. अष्टभुजी माता कूष्मांडा के हाथों में कमंडल, धनुष-बाण, कमल, अमृत-कलश, चक्र तथा गदा है.
स्कंदमाता - इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता। देवी के एक पुत्र कुमार कार्तिकेय (स्कंद) हैं, जिन्हें देवासुर-संग्राम में देवताओं का सेनापति बनाया गया था.
कात्यायनी - इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि। कात्यायन ऋषि की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती उनके यहां पुत्री के रूप में प्रकट हुई और कात्यायनी कहलाई. कात्यायनी का अवतरण महिषासुर वध के लिए हुआ था.
कालरात्रि - इसका अर्थ- काल का नाश करने वली। यह भगवती का विकराल रूप है. गर्दभ (गदहे) पर आरूढ़ यह देवी अपने हाथों में लोहे का कांटा तथा खड्ग (कटार) भी लिए हुए हैं.
महागौरी - इसका अर्थ- सफेद रंग वाली मां। भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए भवानी ने अति कठोर तपस्या की, तब उनका रंग काला पड गया था. तब शिव जी ने गंगाजल द्वारा इनका अभिषेक किया तो यह गौरवर्ण की हो गई. इसीलिए इन्हें गौरी कहा जाता है.
सिद्धिदात्री - इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली। इनकी अनुकंपा से ही समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं.
आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।
नवदुर्गा और दस महाविद्याओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दशमहाविद्या अनंत सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभीदेवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।

पूजा की सामग्री

1. फूल
2. चावल
3. भगवती आसन
4. दूध
5. दही
6. घी
7. शहद
8. शक्कर
9. पंचामृत
10. गंध
11. जल
12. वस्त्र, उपवस्त्र
13. फल
14. सुपारी
15. लौंग
16. इलायची
17. मां दुर्गा देवी की आरती

नवरात्रि कथा
इस पर्व से जुड़ी कई कथाएं है जिसमे से एक यह लोकप्रिय है पौराणिक कथाओं के अनुसार पुराने समय में एक भैंस रूपी असुर था जिसका महिषासुर था। महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया। महिषासुर ने अपनी शक्ति का गलत प्रयोग किया और प्रत्याशित प्रतिफल स्वरूप महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देख देवता विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा है।तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गईं थी। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्ततः महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं।

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होली
होलिका दहन का समय - सांय 6 :29 के बाद
होली एक रंगबिरंगा मस्ती से भरा त्यौहार है। इस दिन सभी लोग एक दूसरे को गुलाल लगते है तथा गीले शिकवे दूर करते है। इस दिन घरो में नए पकवान मनाये जाते है। चारो ओर खुशहाली होती है। बच्चे एवं घरो के बड़े इस त्यौहार को बड़ी धूम धाम से मनाते है। होली एक वसंत ऋतू का त्योहार है होली को रंगों का त्योहार भी खा जाता हैं। होली एक प्राचीन हिंदू धार्मिक त्योहार है जो कि दक्षिण एशिया में लोकप्रिय है। होली एक उत्साह और उमंग से भरा त्यौहार है। विष्णु भक्त इस दिन व्रत भी रखते हैं। होलिका दहन के लिए लोग महीने भर पहले से तैयारी में जुटे रहते हैं. सामूहिक रूप से लोग लकड़ी, उपले आदि इकट्ठा करते हैं और फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन संध्या काल में भद्रा दोष रहित समय में होलिका दहन किया जाता है। होली जलाने से पूर्व उसकी विधि विधान सहित पूजा की जाती है और अग्नि एवं विष्णु के नाम से आहुति दी जाती है।
होली के दिन गली - मुहल्लों में ढोल- मजीरे बजते सुनाई देते हैं। इस दिन लोग लोग समूहों-मंडलियों में मस्त होकर नाचते-गाते नज़र आते हैं। दोपहर तक सर्वत्र मस्ती छाई रहती है। बच्चे पानी में रंगो को मिलते है और एक-दुसरे को नहलाने का आनंद लेते हैं। गुब्बारों में रंगीन पानी भरकर लोगों पर गुब्बारें फेंकना भी बच्चों का प्रिय खेल है। बच्चे पिचकारियों से भी रंगों के पानी की वर्षा करते दिखाई देते हैं।
होली कथा
होली का त्यौहार कई पौराणिक कथाओं से जुडा हुआ है।
पहली कथा शिव और पार्वती की है। हिमालय पुत्री पार्वती चाहती थीं कि उनका विवाह भगवान शिव से हो जाये पर शिवजी अपनी तपस्या में लीन थे। कामदेव पार्वती की सहायता को आये। उन्होंने प्रेम बाण चलाया और भगवान शिव की तपस्या भंग हो गयी। शिवजी को बडा क्रोध आया और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी। उनके क्रोध की ज्वाला में कामदेव का शरीर भस्म हो गया। फिर शिवजी ने पार्वती को देखा। पार्वती की आराधना सफल हुई और शिवजी ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। होली की आग में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकत्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है।
दूसरी कथा हिरण्यकश्यप नाम का एक राक्षस राजा था। उसका पुत्र (प्रहलाद) विष्णु का भक्त था। भक्त प्रह्लाद के पिता हरिण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानते थे। वह विष्णु के विरोधी थे जबकि प्रह्लाद विष्णु भक्त थे। उन्होंने प्रह्लाद को विष्णु भक्ति करने से रोका जब वह नहीं माने तो उन्होंने प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया। पर वो अपने इरादे में सफल नहीं हुए। प्रह्लाद के पिता ने आखर अपनी बहन होलिका से मदद मांगी। होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका अपने भाई की सहायता करने के लिए तैयार हो गई। होलिका प्रह्लाद को लेकर चिता में जा बैठी परन्तु विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जल कर भस्म हो गई। भक्त की विजय हुई और राक्षस की पराजय। उस दिन सत्य ने असत्य पर विजय घोषित कर दी। तब से लेकर आज तक होलिका-दहन की स्मृति में होली का मस्त पर्व मनाया जाता है।यह कथा इस बात का संकेत करती है की बुराई पर अच्छाई की जीत अवश्य होती है। आज भी पूर्णिमा को होली जलाते हैं, और अगले दिन सब लोग एक दूसरे पर गुलाल, अबीर और तरह-तरह के रंग डालते हैं। यह त्योहार रंगों का त्योहार है। इस दिन लोग प्रात:काल उठकर रंगों को लेकर अपने नाते-रिश्तेदारों व मित्रों के घर जाते हैं और उनके साथ जमकर होली खेलते हैं। बच्चों के लिए तो यह त्योहार विशेष महत्व रखता है। वह एक दिन पहले से ही बाजार से अपने लिए तरह-तरह की पिचकारियां व गुब्बारे लाते हैं। बच्चे गुब्बारों व पिचकारी से अपने मित्रों के साथ होली का आनंद उठते हैं।

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शनीश्चरी अमावस्या 9 जनवरी
शनिवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को शनीश्चरी अमावस्या कहा जाता है और शनीश्चरी अमावस्या को शनिदेव का दर्शन, पूजन व दान करना , मान मनौती आदि करना अच्छा माना जाता है । भारतवर्ष और विदेशों में लोग शनीवार को पड़ने वाली शनीश्चरी अमावस्या को शनि पूजा, दान, दर्शन, मान मनौती आदि करने के लिये सर्वोत्म मानते है।इसी प्रकार सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या जिसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है , मंगलवार को पड़ने वाली भौमवती अमावस्या या शुक्रवती अमावस्या या रविती अमावस्या जो कि रविवार को रहती है , इन सबके अलग अलग अर्थ, फल , धर्म , पुण्य विधान मान्य व प्रचलित है ।
सभी अमावस्याओं में कई चीजें महत्वपूर्ण हो जातीं हैं जैसे:- मसलन ग्रह स्थि्ति गणना, नक्षत्र स्थितियां , तिथि की स्थिहति, वार आदि की स्थिरति , कुल मिलाकर ज्योतिषीय गणना , तंत्रिक गणनायें इत्यादि ।
हमारे शास्त्रों में अमावस्या का विशेष महत्तव माना गया है और सबसे खास बात यह है कि यदि अमावस्या शनिवार के दिन पड़े तो इसे सोने पर सुहागा माना जाता है। हमारे विद्वान ॠषि-मुनियों के द्वारा रचे गये हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के 30 दिनों को 15-15 दिनों के दो पक्षों में विभाजित किया गया है शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में। शास्त्रों के अनुसार चंद्रमा की सोलहवीं कला यानि अमावस्या के दिन चांद आकाश में दिखाई नहीं देता है।
इस दिन किये गए पूजा पाठ को काफी शुभ और शक्तिशाली मन जाता है वे लोग जो साढ़े साती , कंटक शनि या शनि की किसी और पीड़ा के प्रभाव में है उन लोगो के यह दिन बेहद महत्वपूर्ण है।
काले टिक के सरसो का तेल चढ़ाने से शनि देव प्रसन्न होते है साथ ही अपराध -स्वीकरण भी शनि देव को प्रसन्न करने का ज़रिया है अगर हमने कोई गलत काम किया है और हम अपनी इस गलती को शनि देव के सामने स्वीकार करते है तो शनि देव इसकी सराहना करते है और प्रसन्न भी होते है। शाम के समय शनि देव की पूजा आराधना और निचले तबके के लोगो भोजन करने से भी शनिदेव प्रसन्न होते है।


शनैश्चरी अमावस्या का महत्तव-
शनैश्चरी अमावस्या को न्याय के देवता शनिदेव जी का दिन माना गया है। इस दिन शनिदेव जी की पूजा विशेष रुप से की जाती है। जिन जातकों की जन्म कुंडली या राशियों पर शनि की साढ़ेसाती और ढैया का असर होता है, उनके लिये शनैश्चरी अमावस्या एक बहुत ही महत्तवपूर्ण अवसर है क्योंकि शनैश्चरी अमावस्या के अवसर शनि जी की पूजा-अर्चना करने पर शांति व अच्छे भाग्य की प्राप्ति होती है। शनैश्चरी अमावस्या के दिन भक्त विशेष अनुष्ठान आयोजित कर पितृदोष और कालसर्प दोष से भी मुक्ति पा सकते है। शनिश्चरी अमावस्या के अवसर पर सुंदरकांड, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान अष्टक आदि का पाठ करने से भी शनि ग्रह के प्रभाव से शांति मिलती है। इसके अलावा शनैश्चरी अमावस्या के दिन पितरों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
शनिदेव से जुड़ी पौराणिक कथा -
मनुष्यों और देवताओं में शनिदेव को अपनी क्रूर और टेढ़ी नजर से आहत करने वाले देवता के रुप में जाना जाता है। लेकिन परम तपस्वी और योगी मुनि पिप्पलाद की दिव्य और तेजोमयी नजरों के सामलने शनिदेव जी एक क्षण भी खड़े नहीं रह सके और विकलांग होकर धरती पर गिर पड़े। शनि को इस प्रकार असहाय देखकर ब्रह्मदेव ने मुनि पिप्पलाद को मनाया, तब मुनि पिप्लाद ने मनुष्यों और देवताओं को शनिदेव के कष्टों से छुटकारा दिलाने के लिये शनि मंत्रों और स्तोत्रों की रचना की। इन मंत्रों और स्त्रोत का पाठ करने से शनि के अशुभ असर और कोप से बचाव होता है।

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Shri Mahakal Bhiarvashtmi Puja (3 Dec 2015)

Shri MahaKal bhairava ashtami occurs on krishna paksha Ashtami of the month of Margasira (3 Dec 2015). Kal Bhairava is another Avatar of Lord Shiva.

खड्गं कपालं डमरुं त्रिशूलं हस्तांबुजे सन्दधतं त्रिणेत्रम् ।
दिगम्बरं भस्मविभूषिताङ्ग नमाम्यहं भैरवमिन्दुचूडम् ॥

Kala bhairava is one of the eight Bharaiva fierce manifestations of Lord Shiva. The eight manifestations, are Kala Bhairava, Asitanga Bhairava, Samhara Bhairava, Ruru Bhairava, Krodha Bhairava, Kapala Bhairava, Rudra Bhirava and Unmatta Bhairava.

Hymns on Kala bhairava highlights a truth; “Time is the most precious. Time lost is lost for ever. Wise people should use every moment of time effectively. Lord Kala Bhairava helps everyone to make one’s time useful.”
Story Relate to this
Shiva Maha Purana mentions the story of Kaal bhairav. The legend says that once a controversy arose among Lord Vishnu, Lord Shiva and Lord Brahma that who was the powerfull of them. In the arguments Brahmaji passed a comment which made Shiva furious. And in his furious forms he cut off one of the faces of Lord Brahma. Outraged Lord Shiva took a destructive form of Kaal Bhairav. In this Avatar, he came riding on a black dog with a baton in one hand. This horrifying form of Lord Shiva scared the demigods. Seeing this, Lord Brahma apologized in front of Kaal Bhairav and realized his mistake. After being convinced by all the Gods, saints, sages and Lord Brahma himself, Lord Shiva restored to his original form and calmed down.
Kal Bhairava’s vehicle is a black dog and in some places dogs are fed on the day.Shiva devotees take morning bath and perform pujas. Special pujas are also offered to dead ancestors in the morning. Staunch devotees keep vigil at night and narrate stories of Mahakaleshwar.

Puja service includes:

• Deep Prajavlit
• Ganpati Puja
• Varun Puja
• Sankalp
• Offer Prayers to Lord Kal Bhairav
• Reciting of Kal Bhairav Stotra and Ashtkam
• Reciting of Vishnu Sahastranaam.

Puja Benefits:

• Freedom from his great obstacles
• Freedom from dangers
• Released from bondage
• Freedom from debts
• Cure from illness
• Gives sudden prosperity.
• To have a healthy physics and good spirit.
• Removal of black magic.
• Helps to improve time management.


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